‘रिंग ही नहीं, जिंदगी की चुनौतियों से भी लड़ना पड़ता है’; सोना जीतने वाली परवीन ने साझा की कहानी

Dehradun: एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक विजेता बॉक्सर परवीन हुड्डा ने हल्द्वानी की उभरतीं बालिका बॉक्सरों को मेहनत, लगन और धैर्य का संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि सफलता हासिल करने के लिए अपना शतप्रतिशत दें, जो करें पूरे दिल से करें। शुरुआत में परिणाम नहीं मिलने पर निराश होने के बजाय लगातार प्रयास करते रहना चाहिए।

रविवार को अपने कोच एवं आईटीबीपी में असिस्टेंट कमांडेंट जोगेंद्र सोन के साथ अमर उजाला हल्द्वानी कार्यालय पहुंचीं परवीन हुड्डा ने मुक्केबाजी की शुरुआत से लेकर ओलंपिक क्वालिफाई की तैयारियों को साझा किया। छोटी उम्र से बॉक्सिंग शुरू करने वाली बालिकाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि शुरुआती दौर में किसी भी काम का परिणाम तुरंत नहीं मिलता। कई बार खेल की बारीकियों को समझने और खुद को बेहतर बनाने में समय लगता है। ऐसे में खिलाड़ियों को हार नहीं माननी चाहिए। खिलाड़ी जब पूरी ईमानदारी से मेहनत करता है तो माता-पिता का सहयोग भी मिलने लगता है।

एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने के बाद अब परवीन का अगला लक्ष्य वर्ष 2028 में लॉस एंजिल्स में होने वाले ओलंपिक खेलों में देश के लिए पदक जीतना है। इसके लिए पहले ओलंपिक क्वालीफाई करना होगा जिसके लिए उन्हें अपने 65 किलोग्राम वर्ग में भारतीय चयन प्रक्रिया में जगह बनाकर विश्व चैंपियनशिप, एशियाई क्वालिफायर या विश्व क्वालिफाइंग टूर्नामेंट में निर्धारित स्थान हासिल करना होगा।

परवीन हुड्डा से बातचीत

 

प्रश्न : एक खिलाड़ी जब देश के लिए पदक जीतता है तो पूरा देश उसका जश्न मनाता है, लेकिन उस पदक के पीछे छिपे अकेलेपन और संघर्ष को बहुत कम लोग जानते हैं। आपकी जिंदगी का सबसे मुश्किल दौर कौन-सा रहा?

 

उत्तर : जब कोई खिलाड़ी पदक जीतता है तो पूरा देश जश्न मनाता है लेकिन उस जीत के पीछे के संघर्ष को बहुत कम लोग जानते हैं। खेल में हार का सामना करना, पदक नहीं मिलना या चोट के कारण खेल से दूर होना खिलाड़ी के लिए मुश्किल दौर होता है। उसे परिवार और त्योहारों से भी दूर रहना पड़ता है। मेरे जीवन का सबसे मुश्किल दौर वर्ष 2024 में आया, जब मेरा चयन ओलंपिक के लिए हुआ था लेकिन किसी कारणवश मैं ओलंपिक में हिस्सा नहीं ले पाई।

प्रश्न : क्या कभी ऐसा हुआ कि रिंग में प्रतिद्वंद्वी से लड़ने से ज्यादा मुश्किल आपको रिंग के बाहर की परिस्थितियों से लड़ना पड़ा?

उत्तर : एक खिलाड़ी का मानसिक रूप से मजबूत होना भी बहुत जरूरी है। कई बार रिंग के अंदर मुकाबला करने से ज्यादा मुश्किल रिंग के बाहर की परिस्थितियों से लड़ना होता है। जब मैं कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक नहीं जीत पाई तो एशियन गेम्स में पदक जीतना मेरे लिए एक बड़ी चुनौती थी। इसकी वजह यह भी थी कि कुछ समय पहले मुझ पर प्रतिबंध लगा था। उस दौरान मैंने रिंग के बाहर मानसिक रूप से कई चुनौतियों का सामना किया।

 

प्रश्न : महिला बॉक्सिंग में भारत की स्थिति मजबूत हुई है लेकिन क्या महिला खिलाड़ियों को आज भी पुरुष खिलाड़ियों के बराबर सुविधाएं और पहचान मिल रही हैं?

उत्तर : हां, बॉक्सिंग में पुरुष और महिला खिलाड़ियों को समान सुविधाएं मिलती हैं। दोनों के लिए एक साथ प्रशिक्षण शिविर भी आयोजित किए जाते हैं। हालांकि, प्रोफेशनल बॉक्सिंग अभी भारत में उतनी विकसित नहीं हुई है। इसे देश में अभी उतना प्रोत्साहन और बढ़ावा नहीं मिल रहा है।

प्रश्न : अगर हल्द्वानी की कोई 12-14 साल की लड़की आपसे कहे कि वह आपकी तरह देश के लिए पदक जीतना चाहती है तो उसे सबसे पहली सलाह क्या देंगी?

उत्तर : मैं उसे यही सलाह दूंगी कि जो भी करें, पूरे मन से करें। किसी भी काम को पूरा करने के लिए इच्छाशक्ति का होना बहुत जरूरी है। अगर आप पूरी मेहनत और लगन से बेहतर करने का प्रयास करेंगे तो आपके माता-पिता भी आपका सहयोग करेंगे। कभी हार न मानें और प्रयास जारी रखें। कई बार चीजों को समझने और उनका परिणाम मिलने में समय लगता है।

कोच जोगेंद्र सोन से बातचीत

 

प्रश्न : परवीन जैसी खिलाड़ी को तैयार करने में कोच की भूमिका कितनी होती है?

उत्तर : खेल चाहे कोई भी हो, लेकिन अगर खिलाड़ी में इच्छाशक्ति नहीं है तो वह किसी भी खेल में सफल नहीं हो सकता। मैंने परवीन में विषम परिस्थितियों का सामना करने और उनसे उबरकर दमदार वापसी करने की क्षमता देखी है।

प्रश्न : किसी युवा खिलाड़ी में अंतरराष्ट्रीय स्तर का मुक्केबाज बनने की क्षमता पहचानने के लिए आप सबसे पहले किन तीन गुणों को देखते हैं?

उत्तर : लक्ष्य हासिल करने की इच्छाशक्ति, विषम परिस्थिति से निकलने की क्षमता और अनुशासन।

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